શબ્દ સાધકો

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Wednesday, October 19, 2016

Dilip V. Ghaswala's Poetry(દિલીપ વી. ઘાસવાળા ની રચનાઓ)

♥ ગઝલ - નિકળે છે ♥

અરે, મત્સ્ય વહાલી બની નીકળે છે
અને એક દરિયો ભીતર ખળભળે છે.

તને વાંચું અજવાસમાં હું સ્મરણના,
અચાનક શરમથી નયન પણ ઢળે છે.

અસર મહેકતી હો મધુર સ્મિતની ખુદ,
હૃદય મીણની જેમ આ પીગળે છે

જલે ઉંબરે દીપ તારા ખયાલે,
પળો મૃદુ સાન્નિધ્યની ઝળહળે છે.

હયાતી નથી તારી અંગત જીવનમાં,
વિરહની કણી આંખમાં સળવળે છે.

હશે ભાગ્યમાં કૈં મુસીબત લખેલી,
ગમે તેટલી ટાળું પણ ક્યાં ટળે છે ?
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☆ ગઝલ ...નિકળે છે ☆

સખી મતસ્ય કન્યા બની નિકળે છે,
અને એક દરિયો હજી ખળભળે છે.

હું વાંચું તને યાદના અજવાળામાં,
અચાનક શરમથી નયન આ ઢળે છે.

ઉની આંચ છે તારા સ્મિતની ભૈ,
હૃદય મીણની જેમ આ પીગળે છે. 

તમારા નામે દિપ જલે ઉંબરા પર,
મધુર સ્મરણોથી હૃદય ઝળહળે છે.

હયાતી નથી તારી આ જિંદગીમાં,
હજારો પ્રશ્નો આંખમાં સળવળે છે. 

નસીબમાં લખેલી મુસીબત ને "દિલીપ",
ગમે એટલી ટાળો પણ કયાં ટળે છે?
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ગઝલ - આમ જ જીવવા નું હોય છે

 ખૂબ ગમતી વાતથી મન વાળવાનું હોય છે.
આપણે તો દોસ્ત આમ જ જીવવા નું હોય છે;

આ જગત બસ ચેનથી ઉંઘી શકે એ કારણે,
હા.. અમારે તો અહીંયા જાગવાનું હોય છે;

એ જરૂરી તો નથી જે ચાહો એ તમને મળે,
પણ બધા માંગે બધું એ આપવા નું હોય છે;

                             
આ જગત ના રીત રિવાજો ગમે કે ના ગમે,
સૌ ને માટે સૌની સાથે ચાલવાનું હોય છે;

બોલવાની તક તને મૃત્યુ નહિ આપે "દિલીપ"
જ્યાં સુધી આ જિંદગી છે, દોડવાનું હોય છે
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ગઝલ : કરી લીધું...

આયખાને મરણ કરી લીધું,
મેં જ મારું હરણ કરી લીધું.

આદરી શોધ મારી તારા માં
કેમ તે આવરણ કરી લીધું.

વિશ્વ આખું થયું જુઓ ઝળહળ,
પ્રેમથી જ્યાં સ્મરણ કરી લીધું.

જ્યાં પ્રતિક્ષાઓ ધ્વાર ખખડાવે,
અટકળે અવતરણ કરી લીધું.

હું પણાએ તો હદ કરી નાખી,
દુખ તણું મેં સંસ્કરણ કરી લીધું

ફૂલ અને મહેક ની લડાઇએ
ગમતીલું આક્રમણ કરી લીધું.

મહેક થી મસ્ત ગાતા ઝરણાએ,
પૃથ્વી પર અવતરણ કરી લીધું..

જ્યારથી પ્રેમની લિપી ભૂંસી,
ત્યાર થી મન અભણ કરી લીધું.

પુત્ર છું હું વસંતનો "દિલીપ"
"ઘાસ"નું લીલું રણ કરી લીધું.
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ગઝલ - વસેલી છે..

હજી આંખોમાં પ્યારી એ છબી એની વસેલી છે,
એ પાછી આવશે જોવા નજર રસ્તે પડેલી છે.

નથી ભુલયો હજી હું એનું ઘર એની ગલી રસ્તો.
કે એના ઘરની સામે એજ બસ જૂહી ચમેલી છે.

ફરી જોવા મળે આજે મને માસુમ ચહેરો;
કે એના ઘરની બારી આજ તો થોડી ખુલેલી છે.

અધર બિંબ લાલ એના, કાળી ઝુલફો, ગાલ પર ખંજન;
ચમનની અધખિલી કળીઓ બધી એની સહેલી છે.

કે ભીના વાળ સુકવવા ઝરોખે એનું આવવું,
ખબર નહિ જોઇને મુજને નજર એની ઝુકેલી છે .

ફકત્ત એકવાર જોઇ એને મારું દિલ નથી ભરાતું
હવે બસ પામવા એને તમન્ના ઓ વધેલી છે
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દિલીપ  વી. ઘાસવાળા

Wednesday, July 6, 2016

गजल अभ्यास

कुछ जानकारी जो आपको गजल शिखने मे कम आएगी।


गजल सीखने के लिए जरूरी है कि आपको
१-मात्रा ज्ञान हो।
२-रुक्न (अरकान) की जानकारी हो।
३-बहरों का ज्ञान हो।
४-काफ़िया का ज्ञान हो।
५-रदीफ का ज्ञान हो।
और फिर शेर और उसका मफ़हूम (कथन)।
एवं गजल की जबान की समझ हो।

१- मात्राज्ञान-

क) जिस अक्षर पर कोई मात्रा नहीं लगी है या जिस पर छोटी मात्रा लगी हो या अनुस्वार  लगा हो सभी की एक (१) मात्रा
गिनी जाती है.

ख) जिस अक्षर पर कोई बड़ी मात्रा  लगी हो या जिस पर   अनुस्वार  लगा हो  या जिसके बाद क़ोई आधा  अक्षर   हो सभी की दो (२) मात्रा
गिनी जाती है।

ग) आधाअक्षर की एक मात्रा उसके पूर्व के अक्षर की एकमात्रा  में जुड़कर उसे दो मात्रा का बना देती है।

घ) कभी-कभी आधा अक्षर के पूर्व का अक्षर अगर दो मात्रा वाला पहले ही है तो फिर आधा अक्षर की भी एक मात्रा अलग से गिनते हैं. जैसे-रास्ता २ १ २ वास्ता २ १ २ उच्चारण के अनुसार।
ज्यादातर आधा अक्षर के पूर्व  अगर द्विमात्रिक है तो अर्द्धाक्षर को छोड़ देते हैं उसकी मात्रा नहीं गिनते. किन्तु  अगर पूर्व का अक्षर एक मात्रिक है तो उसे दो मात्रा गिनते हैं. विशेष शब्दों के अलावा जैसे इन्हें,उन्हें,तुम्हारा । इनमें इ उ तु की मात्रा एक ही गिनते हैं। आधा अक्षर की कोई मात्रा नहीं गिनते।

च) यदि पहला अक्षर ही आधा अक्षर हो तो उसे छोड़ देते हैं कोई मात्रा नहीं गिनते। जैसे-प्यार,ज्यादा,ख्वाब में प् ज् ख् की कोई मात्रा नहीं गिनते।

उम्मीद है कि आपने अबतक मात्रा गिनने का पर्याप्त अभ्यास कर लिया होगा।
कुछ अभ्यास यहाँ दिए जा रहे हैं।

शब्द.       उच्चारण.    मात्रा (वजन)
कमल.      क मल.           १२
रामनयन.  रा म न यन.   २११२
बरहमन.     बर ह मन      २१२
चेह्रा              चेह रा         २२
शम्अ.         शमा            २१
शह्र.             शहर.         २१
जिन्दगी        जिन्दगी       २१२
कह्र.             कहर.          २१
तुम्हारा         तुमारा         १२२
दोस्त.           दोस्त.          २१
दोस्ती            दो स् ती      २१२
नज़ारा          नज़्जारा       २२२
                      नज़ारा         १२२
                       नज़ारः        १२१

२- रुक्न /अरकान-

 रुक्न को गण ,टुकड़ा या खण्ड कह सकते हैं।
इसमें लघु (१) और दीर्घ (२) मात्राओं का एक निर्धारित क्रम होता है।
 कई रुक्न (अरकान) के मेल से मिसरा/शेर/गज़ल बनती है।।
इन्हीं से बहर का निर्माण होता है।
मुख्यतः अरकान कुल आठ (८) हैं।

नाम              वज़न        शब्द
१-मफ़ाईलुन.  १२२२.   सिखाऊँगा
२-फ़ाइलुन.     २१२.     बानगी
३-फ़ऊलुन.     १२२.    हमारा
४-फ़ाइलातुन.  २१२२. कामकाजी
५-मुतफ़ाइलुन११२१२ बदकिसमती
६-मुस्तफ़इलुन  २२१२ आवारगी
७-मफ़ाइलतुन १२११२ जगत जननी
८-मफ़ऊलात  ११२२१ यमुनादास

ऐसे शब्दों को आप खुद चुन सकते हैं।
इन्हीं अरकान से बहरों का निर्माण होता है।

३-बहर-

रुक्न/अरकान /मात्राओं के एक निश्चित क्रम को बहर कहते हैं।
इनके तीन प्रकार हैं-
१-मुफ़रद(मूल) बहरें।
२-मुरक्क़ब (मिश्रित) बहरें।
३-मुजाहिफ़ (मूल रुक्न में जोड़-तोड़ से बनी)बहरें।
बहरों की कुल संख्या अनिश्चित है।
गजल सीखने के लिए बहरों के नाम की भी कोई जरूरत नहीं। केवल मात्रा क्रम जानना आवश्यक है,इसलिए यहाँ प्रचलित ३२ बहरों का मात्राक्रम दिया जा रहा है। जिसपर आप गजल कह सकते हैं, समझ सकते हैं।

1)-11212-11212-11212-11212

2)-2122-1212-22

3)-221-2122-221-2122

4)-1212-1122-1212-22

5)-221-2121-1221-212

6)-122-122-122

7)-122-122-122-122

8)-122-122-122-12

9)-212-212-212

10)-212-212-212-2

11)-212-212-212-212

12)-1212-212-122-1212-212-22
     -12122-12122-12122-12122

13)-2212-2212

14)-2212-1212

15)-2212-2212-2212

16)-2212-2212-2212-2212

17)-2122-2122

18)-2122-1122-22

19)-2122-2122-212

20)-2122-2122-2122

21)-2122-2122-2122-212

22)-2122-1122-1122-22

23)-1121-2122-1121-2122

24)-2122-2122-2122-2122

25)-1222-1222-122

26)-1222-1222-1222

27)-221-1221-1221-122

28)-221-1222-221-1222

29)-212-1222-212-1222

30)-212-1212-1212-1212

31)-1212-1212-1212-1212

32)-1222-1222-1222-1222

एक बहर जिसे मात्रिक बहर भी कहते हैं ,हिन्दी गजलकारों ने ज्यादा प्रयोग किया है।
 २२ २२ २२ २२
२२२ २२२ २२२ २२२
२२२२ २२२२ २२२२ २२
इत्यादि।

विशेष-१)

जिन बहरों का अन्तिम रुक्न 22 हो उनमें 22 को 112 करने की छूट हासिल है।
२) सभी बहरों के अन्तिम रुक्न में एक 1(लघु) की इज़ाफ़त (बढ़ोत्तरी)  करने की छूट है। किन्तु यदि सानी मिसरे में इज़ाफ़त की गयी है तो गज़ल के हर सानी मिसरे में इज़ाफ़त करनी होगी.जबकि उला मिसरे के लिए कोई प्रतिबन्ध नहीं है. जिसमें चाहे करें और जिसमें चाहें न करें।
३) दो बहरें
१-२१२२-११२२-२२ और
२-२१२२-१२१२-२२ के पहले रुक्न २१२२ को ११२२ किसी भी मिसरे मे करने की छूट हासिल है।

४) मात्रिक बहरों २२ २२ २२ २२ इत्यादि  जिसमें सभी गुरु हैं ,में -
(क- ). किसी भी (२)गुरु को दो लघु (११) करने की छूट इस शर्त के साथ हासिल  है कि यदि सम के गुरु (२) को ११किया गया है तो सिर्फ सम को ही करें और यदि विषम को तो सिर्फ विषम को। मतलब यह कि या तो विषम- पहले,तीसरे,पाचवें,सातवें,नौवे आदि में सभी को या जितने को मर्जी हो २ को ११ कर सकते हैं। या फिर सिर्फ सम -दूसरे,चौथे,छठवें,आठवें.आदि के २ को ११ कर सकते हैं।
(ख-). २२२ को १२१२,२१२१ ,२११२ भी कर सकते हैं।

कुछ अभ्यास तक्तीअ (गिनती/विश्लेषण) के साथ-

A-
2122 1212 22
दोस्त मिलता /नसीब से /ऐसा,
2122.          /1212.     /22

जो ख़िजा को /बहार कर/ता है।।
2122.          /1212.     /22

B-
1222 1222 1222 1222
दिया है छो/ड़ उसने भो/र में अब भै/
1222.     /1222.       /1222        /
रवी गाना,
1222

मुहब्बत की /वो मारी बस/
1222.       /1222.        /
 विरह के गी/त गाती है।।
1222.       /1222
 
C-
2122 2122 2122 212
हुश्न औ ई/मान तक है  /
2122.     /2122          /
बिक रहा बा/जार में,
2122.       /212

शर्म आती /है तिजारत /
2122.     /2122.       /
से तिजारत/ क्या करूँ।।
2122.      /212

D-
1212 1122 1212 112
किसी का हुश्/न नहीं को/
1212.          /1122.      /
ई भी शबा/ब नहीं।
1212.    /112

मेरे नसी/ब में शायद /कोई गुला/
1212. /1122.        /1212.     /
ब नहीं।।
112

E-
221 2121 1221 212
गुलदस्ता /ए ग़ज़ल हो/
221.       /2121.       /
 कि तुम कोई/ ख्वाब हो।
1221         /212

बाद ए त/हूर ए हुस्न ओ /
221.     /2121.             /
अदा लाज/वाब हो।।
1221.      /212

F-
2222 2222 2222 222
पाकिस्तानी /बोल बोलते,
2222         /21212
कुछ अपने ही /साथी हैं,
2222.          /222

जन-गण-मन की /हार लिखें या,/
2222.               /21122.         /
 फिर उनको गद्/दार लिखें।।
2222.           /2112

ऐसे ही आप अपनी व अन्य की गजलों की तक्तीअ कर के अपना अभ्यास बढ़ा सकते हैं।

4- क़ाफ़िया (समान्त)-

क़ाफ़िया समझने के लिए पहले एक गज़ल लेते हैं जिससे समझने में आसानी हो।

गजल-

बहर-१२२२-१२२२-१२२२-२२
क़ाफ़िया-आने
रदीफ़-वाले हैं।
गज़ल-
सुना है वो कोई चर्चा चलाने वाले हैं।
सदन में फिर नया  मुद्दा उठाने वाले हैं।।(मतला).🌷

अदब से दूर तक रिश्ता नहीं कोई जिनका,
सलीका अब वही हमको सिखाने वाले हैं।।

लगा के ज़ाल कोई अब वहाँ  बैठे  होंगे,
सुना है फिर से वो हमको मनाने वाले हैं।।

बड़ी मुश्किल से हम  निकले हैं जिनकी चंगुल से,
सुना है फिर कोई फ़न्दा लगाने वाले हैं।।

भरोसा अब नहीं हमको है जिनकी बातों पर,
नया वो दाव कोई आजमाने वाले हैं।

हैं फिर नज़दीकियाँ हमसे बढ़ाने आये जो,
कोई इल्जाम क्या वो फिर लगाने वाले हैं।।

पता जिनको नहीं है खुद के ही हालातों का,
मिलन तकदीर वो मेरी बताने वाले हैं।।(मक्ता).🌷
     --------मिलन.

इस गजल में काफिया के शब्द हैं-
चलाने,उठाने,सिखाने,मनाने,लगाने,आजमाने,लगाने, बताने।
आप देख रहे हैं कि काफिया के शब्द सचल हैं। बदलते रहते हैं। हर शब्द में एक अक्षर अचल है -ने,और एक स्वर अचल है आ। दोनों को मिलाकर काफिया बना है-आने,
इस प्रकार हम देखते हैं कि क़ाफिया भी अचल है किन्तु काफिया के शब्द सचल।
अगर हम काफ़िया के शब्दों से आने निकाल दें तो बचेगा-चल,उठ,सिख,मन आदि. सभी समान मात्रा या समान वजन के हैं।

काफ़िया की मुख्य बातें-

१-काफ़िया के शब्द से काफिया निकाल देने पर जो बचे वो समान स्वर और समान वजन के हों।
२-काफ़िया के रूप में (हमारे) के साथ (बहारें) ,हवा के साथ धुआँ  नहीं ले सकते । अनुस्वार (ं) का फर्क है।
३-मतले के शेर से ही क़ाफ़िया तय होता है और एक बार क़ाफ़िया तय हो जाने के बाद उसका अक्षरशः पालन पूरी गजल में अनिवार्य होता है।

 5- रदीफ़(पदान्त)-

१-क़ाफ़िया के बाद आने वाले  अक्षर,शब्द, या वाक्य को रदीफ़ कहा जाता है।
२-यह मतले के शेर के दोनो मिसरों में और बाकी के शेर के सानी मिसरे में काफिया के साथ जुड़ा रहता है।
३-यह अचल और अपरिवर्तित होता है। इसमें बदलाव नहीं होता।
४-यह एक अक्षर का भी हो सकता है और एक वाक्य का भी। किन्तु छोटा रदीफ़ अच्छा माना जाता है।
५- शेर से रदीफ़ को निकाल देने पर यदि शेर अर्थहीन हो जाए तो रदीफ़ अच्छा माना जाता है।

गजल-

१-पहले शेर को मतले का शेर कहा जाता या गजल का मतला (मुखड़ा)।
जिसके दोनो मिसरों(पंक्तियों): मिसरा उला (पहली या पूर्व पंक्ति) और मिसरा सानी (दूसरी पंक्ति या पूरक पंक्ति) दोनों में रदीफ़ (पदान्त) होता है।
२-गजल में कम से कम पाँच शेर जरूर होने चाहिए।
३-गजल का आखिरी शेर जिसमें शायर का नाम होता है; को मक्ते का शेर या मक्ता कहा जाता है।
४-बिना रदीफ़ के भी गजल होती है जिसे ग़ैरमुरद्दफ़ (पदान्त मुक्त) गजल कहते हैं।
५-यदि गजल में एक से अधिक मतले के शेर हैं तो पहले के अलावा सभी को हुस्ने मतला (सह मुखड़ा)  कहते हैं।
६-बिना मतले की गजल को उजड़े चमन की गजल, बेसिर की गजल,सिरकटी गजल,सफाचट गजल,गंजी गजल आदि नाम मिले हैं।हमें ऐसी गजल कहने से बचना चाहिए।
७-बिना काफ़िया गजल नहीं होती।

 गजल के कुछ नियम-

१-अलिफ़ वस्ल का नियम -
एक साथ के दो शब्दों में जब अगला शब्द स्वर से शुरु हो तभी ये सन्धि होती है। जैसे- हम उसको=हमुसको,
आखिर इस= आखिरिश,अब आओ=अबाओ।
ध्यान यह देना है कि नया बना शब्द नया अर्थ न देने लगे।
जैसे- हमनवा जिसके=हम नवाजिस के

२-मात्रा गिराने का नियम-
१) संज्ञा शब्द और मूल शब्द के अतिरिक्त सभी शब्दों के शुरु और आखिर के दीर्घ को  आवश्यकतनुसार गिराकर लघु किया जा सकता है।  इसका कोई विशेष नियम नहीं है,उच्चारण के अनुसार गिरा लेते हैं।
२) जिन अक्षरों पर ं लगा हो उसे नहीं गिरा सकते। पंप, बंधन आदि।
३) यदि अर्द्धाक्षरों से बना कोई शब्द की मात्रा दो है तो उसे नहीं गिरा सकते।जैसे क्यों ,ख्वाब,ज्यादा आदि।

३-
मैं के साथ मेरा
तूँ के साथ तेरा
हम के साथ हमारा
तुम के साथ तुम्हारा
मैं के साथ तूँ
मेरा के साथ तेरा
हम के साथ तुम
हमारा के साथ तुम्हारा
का प्रयोग ही उचित है ।

 ४-
एकबचन और बहुबचन एक ही मिसरे में न हो ,और अगर होता है तो शेर के कथन में फर्क न हो।
५-
🌷🌷🌷🌷🌷🌷
ना की जगह न या मत का प्रयोग उचित है।
६-
अक्षरों का टकराव न हो
 जैसे- तुम-मत-तन्हा-हाजिर-रहना-नाखुश में म,त,हा,र का टकराव हो रहा है। इनसे बचना चाहिए।
७-
मतले के अलावा किसी उला मिसरे के आखिर में रदीफ के आखिर का शब्द या अक्षर होना दोषपूर्ण है।
८-
किसी मिसरे में वजन पूरा करने के लिए कोई शब्द डाला गया हो जिसके होने या न होने से कथन पर फर्क नहीं पड़ता ऐसे शब्दों को भर्ती के शब्द कहा जाता है। ऐसा करने से बचना चाहिए।

गज़ल की ख़ासियत-

अच्छी गजल वह है-
१) जो बहर से ख़ारिज़ न हो।
२) क़ाफ़िया रदीफ़ दुरुस्त हों।
३) शेर सरल हों।
४) शायर जो कहना चाहता है वही सबकी समझ में आसानी से आए।
५) नयापन हो।
६) बुलन्द खयाली हो।
७) अच्छी रवानी हो।
८) शालीन शब्दों का प्रयोग हो।

उम्मीद है कि आप सब गजल की बहुत सी बारीकियों
 से वाकिफ होंगे
------------------------------- शायर अमोल

Thursday, June 16, 2016

Purnima Bhatt "Trusha"'s Gazals(પૂર્ણિમા ભટ્ટ "તૃષા" ની ગઝલ)

વેદનાની આગમાં અંતર જલે દિનરાત પણ,
આગને સંકોરવા કોનો સહારો શોધવો ?

વેંઢરું હું વેદનાને એકલી પણ ક્યાં સુધી ?
દર્દ ચાલ્યું જાય એવો માર્ગ સારો શોધવો ?

લ્યો નથી કઈ કારણે, કોઈ નથી મારું રહ્યું,
શીદને મારે નવો પડકાર મારો શોધવો !

વ્હેણ જીવનમાં હંમેશાથી મને સામા મળ્યા,
આવડ્યું ના તરવુ મઝધારે કિનારો શોધવો ?

ના ઝુકયું નભ પણ કદી મારી ક્ષિતીજે  ઉમ્રભર,
જીવવાને, આશનો ખરતો સિતારો શોધવો ?

આગઝરતા સૂર્યથી ફેલાતુ રણનું મૃગજળ,
ઝાંઝવા મહીં લીલુડો કુંજલ નજારો શોધવો ?

સાવ નિર્જન વન સમી ભેંકાર વીતી જિંદગી,
પાનખરની બીક ,કોયલનો ઇશારો શોધવો ?

રાખ ઊડી તોય " તૃષા " કાં ન છીપી લાશની ?
છે ભરેલો અગ્નિ, તો જલતો અંગારો શોધવો  ?
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છંદ :ગાગાલ  ગાલગાલ લગાગાલ ગાલગા

હું પૂર્ણ પ્રિય, ચંદ્રમુખી શીદ ને કહો  ?
છું પૂર્ણિમા હુ, ચંદ્રમુખી શીદ ને કહો  ?

લાંછન શશીનુ એવુ, ગળે રાહુ ચંદ્રને,
છું મોક્ષિતા હુ, ચંદ્રમુખી શીદ ને કહો  ?

પાક્ષિક પૂર્ણતા જ રહે ચંદ્રની જુઓ,
છું પૂર્ણતા હુ, ચંદ્રમુખી શીદ ને કહો ?

ખીલેલ પૂર્ણ ચંદ્ર સમો પ્રેમ આપણો,
છું ચંદ્રિકા હુ, ચંદ્રમુખી શીદ ને કહો ?

" તૃષા " નિહાળુ, ચંદ્ર કળા સંગ ખીલતી,
છું ઊર્જિતા હુ, ચંદ્રમુખી શીદ ને કહો ?
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છંદ: ગાલગાગા ગાલગાગા ગાલગાગા ગાલગા

ઝાંકળે આકાશ ડૂબ્યાની ગઝલ લખવી હતી,
આંખમાંથી આંસુ ખૂટ્યાની ગઝલ લખવી હતી,,

નોખુ કંપન, ને હતું નૉખું પ્રથમ રાતે મિલન,
એ તમારો હાથ સ્પર્શ્યા ની ગઝલ લખવી હતી,,

શૂન્યવત બેઠાં હતા સામે,,ઉઠાવીને ઘુંઘટ,
એ ! અચાનક હોંઠ ચૂમ્યાની ગઝલ લખવી હતી,,

જો હતું નિશ્ચિત ગમન પણ આપનું,, અંતિમ પળે,
અંતરે થી ઉર્મિ ઉભર્યાની ગઝલ લખવી હતી,,

આંસુ પણ એ મોંઘુ, આંખે ખાળ્યું જાતી વેળનું,
વ્હેતું ગાલે એ, ન રોકયાની ગઝલ લખવી હતી,

તૃપ્ત ના થઇ જાણુ "તૃષા", ને હતી આંખો સજળ,
હાથથી એ હાથ છૂટયાની ગઝલ લખવી હતી..
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છંદ...ગાલગાગા ગાલગાગા ગાલગા

એક તક બસ એક તક આપો મને,
છો તમે ક્યાં ?એક શક આપો મને,

છે ખુદા, એ કેમ શ્રદ્ધા રાખવી  ?
હોઉ "હું",એવી ઝલક આપો મને,

ના મળ્યો, કોઈ પુરાવો, આપનો,
પ્રેમ હોવાની કસક ,આપો મને,,

જો વસો ચોપાસ, દેખાતા નથી !
હાજરી હો, એક સબક આપો મને,

નભ ઝુકે, છીપાય "તૃષા", ક્ષીતિજે,
લાલ રંગેલી, ફલક આપો મને..
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છંદ : ગાગાલગા *4 આવર્તન

તરહી રચના........

કણ કણ કરી ભેગું કરો તો તેતરો લૂંટી જશે,,
ચીં ચીં કરી ચકલી બધી,પરથી પ્રણય લૂંટી જશે....

ભગવાનની આ છે,બધી રચના નિસર્ગી, નિર્ભયી..
શાને કરે ઘોંઘાટ, કઇ છે તારુ ? જે ખૂંટી જશે !!

સંભાળ તારા કાર્યક્ષેત્રે તું, એ માનવ ! ભાગ ના,,
બ્હાનું કરી લે  તું સમયનું,,, કાર્ય જો છૂટી જશે,..

સંઘરવુ સઘળું કેટલું ? તું બાંટ જરુરતમંદને,
જો આવશે, ધસમસતુ પાણી, પાળ પણ તૂટી જશે...

મમતા, લગન, સંપત્તિની,, "તૃષા" ઘણી છે નામની,,
ઇશ ને ભજી લે, કોઇ તારો શ્વાસ જો ઘુંટી જશે....
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પૂર્ણિમા ભટ્ટ "તૃષા" 

Saturday, June 4, 2016

Himal Pandya "Parth"'s Ghazals(હિમલ પંડ્યા "પાર્થ" ની ગઝલ)

વિષના પ્યાલા સતત પીવાય છે,
કોઇ પૂછે તો કહું, જીવાય છે! 

અેટલું કહીને એ છૂટી જાય છે,
જે થવાનું હોય છે, એ થાય છે;

આંખથી વહેતી રહે પીડા બધી,
આપણાંથી ક્યાં કશું સચવાય છે? 

રોજ એકાદો ભરમ ભાંગી જતો!
એ નથી હોતું જ, જે દેખાય છે; 

એક પત્થર તો ય પીગળતો નથી,
લાખ દોરા-ધાગા-બાધા થાય છે;

વાંક જેવો નીકળે તકદીરનો,
હોઠ ફરિયાદોતણાં સીવાય છે;

લે, તું તારે કચકચાવી વાર કર!
મોત! શાને આટલું મુંઝાય છે? 

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ખુશબુ થઈએ, શ્વાસમાં રહીએ; 
એમની આસપાસમાં રહીએ; 

ના પડી જાય કોઠે અંધારું,
બે ઘડી તો ઉજાસમાં રહીએ;

મોકળા મનથી બસ જીવાતું હો!
લાગણીના લિબાસમાં રહીએ;

સુખ મળી જાય છે અગર શોધો!
ચાલ, એની તપાસમાં રહીએ;

હું અને તું નું બહુવચન કરીએ,
એકલાં નહિ, સમાસમાં રહીએ;

કાયમી જો ગઝલમાં વસવું હો.
છંદમાં રહીએ, પ્રાસમાં રહીએ;

આવી મળશે મુકામ સામેથી,
એકધારા પ્રવાસમાં રહીએ; 

"પાર્થ" એવું કશું કરી જઈએ;

કે સ્મરણમાં, સુવાસમાં રહીએ.

હિમલ પંડ્યા
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मिलननुं गीत माराथी घणा वखते गवायुं छे,
न जाणे केम वर्तन आज एनुं ओरमायु छे!?


आ नातो जोड़वा माटे नथी कोई जबरदस्ती,
बतावी दो के बीजुं कोण माराथी सवायु छे?


बधाने प्रेम आप्यो छे, बधानो प्रेम जीत्यो छे;
ह्रदय क्यां कोइनु क्यारेय माराथी घवायुं छे?


मुसीबतने हुं बिरदावुं के मानुं पाड़ हिम्मतनो?
नथी ज्यां कोइ पण पहोंची शक्युं त्यां पण जवायुं छे!


फरीथी ए ज घटना, ए ज पात्रो, ए ज संदर्भो;
मजानुं दृश्य केवुं आंखनी सामे छवायुं छे!


ग़ज़ल छे जिंदगी मारी, ग़ज़ल छे बंदगी मारी!
तमारे मन हशे शब्दो, अमारो प्राणवायु छे.

 हिमल पंड्या "पार्थ"

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Friday, June 3, 2016

Mehbub Sonaliya's Gazal(મેહબૂબ સોનાલીયા ની ગઝલ)

ગમ્યું નથી જે કદી તે ગમાડવા લાગ્યાં
અમે બસ એમ હ્રદયને રમાડવા લાગ્યાં.

એલાર્મો હારી ગયા એક ધારા વાગીને
અને તમે શું જગત ને જગાડવા લાગ્યાં

જગત ની દોડ મહીં થાય છે વિજય કોની?
વધુ જે દોડે બધા એને પાડવા લાગ્યાં.

અહીં તો હાસ્ય બધા સાવ ભૂલી બેઠા છે 
ફકત જનાજા દુઃખો ના ઉપાડવા લાગ્યાં.

જગત ને ટેવ છે મહેબૂબ નખ થી ખણવા ની.
તમે જખમ શું બધા ને બતાડવા લાગ્યાં.

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સફર જીવન ની એમ જ આદરું છું.
તને 'હોવાપણું' મારું, ધરું છું.

અંગરખો દંભ નો મોટો છે કદ થી
બધા થી એટલે નોખો તરું છું.

અરીસો કોણ કે' સાચું જ બોલે?
મને જોઉં છું, જોયા કરું છું.

તને ખોવાય જાવાનો જ ડર છે.
મને હું જો મળું છું તો ડરું છું.

ઉપાધિઓ બધી મહેબૂબ જી હું

નિમંત્રણ દઈ અને ક્યાં નોતરું છું.
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મહેબુબ સોનાલિયા

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सोच की बैसाखियों को बस बदल लेता हूँ मैं
है तो सौ दुशवारियाँ पर हस के चल लेता हूँ मैं।

तीरगी मुझसे उलजने की न जिद करना कभी
खुश्क हो जाये दिये तो खुद ही जल लेता हूँ मैं

जीते रहेने की तलब ने मार डाला है ज़मीर
जैसे भी हालात हों वैसे ही ढल लेता हूँ मैं।

देखले कोई न बहती आंसूओं की धार को
इस तरह बरसात में थोड़ा टहेल लेता हूँ मैं।

आँख पर पट्टी लगाकर दौड़ना शमशीर पर
जिंदगी के रास्ते पे फिर भी चल लेता हूँ मैं।

सत्यावादी हूँ अगर अवसर नहीं मिलता मुझे
सच तो ये है सोच का पैकर बदल लेता हूँ मैं।

जिंदगी 'महेबुब' को तुजसे कोई शिकवा नहीं
जितना तू छलती है मुजको उतना फल लेता हूँ मैं।


महेबुब सोनालिया